तुम्हारे लिखे हुए उन खतों के गुलाबी हर्फ़ अब पीले पड़ने लगे हैं.... अब उनमें वो नरमी भी नहीँ वक़्त की मार ने उनको भी सख्त कर दिया है.....
एक पूरा लिखा अधूरा प्रेमपत्र आज भी किताबों के बीच पड़ा हैं जिसे पूरा होने के लिए बस उसके हाथों तक पहुँचना था.....
मैं छुप छुप के तुम्हे देखने की वो आदत नही भूला…
भीगी सी तुम जब स्कूल से लौटती थी वो सावन नही भूला…
जब चाहती थी तुम मुझे अपने खिलौनों से ज़्यादा…
मैं अब तक वो नादान सा बचपन नही भूला…
तुम भूल गई हो शायद वो खाली पड़ा पुराना मकान मुहल्ले का…
मगर जहां तुम मोरनी बन नाचती थी मैं वो आंगन नही भूला…
एक बार याद है ज़िद तुमने एक अजीब सी पकड़ी थी…
मैं तुम्हारी खुशी के लिये लिस पर चढ़ते हुये गिरा था वो जामुन नही भूला…
दुआ करता रहा के वो आंखें फिर ना कभी बरसें…
मगर मैं वो आखरी मुलाकात में तुम्हारे बरसते हुये नयन नही भूला…
तुम्हे अब याद हो ना हो मगर मै वो नादान बचपन नही भूला…
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